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रेत की औरत, तारे का दरबार
About this book
रण के नमकीन रेगिस्तान में जन्मी नैना ने सारी उम्र निर्दय सूरज के नीचे बिताई है — जहाँ पानी गिना जाता है और औरतें ऊँट की खाल पर दरी बुनती हैं। पर्वतों के उस पार व्योमगढ़ है: एक नगर जिसका आकाश तीन सौ बरस से एक जादुई छत्र के नीचे बंद है, जहाँ सतत गोधूलि रहती है और जहाँ पकड़ी हुई तारों की रोशनी से बुना रेशम सत्ता की मुद्रा है। मरने से पहले नैना की दादी कमलादेवी एक काला डिब्बा उसके हाथ में रखती है और चालीस बरस पुराना कलंक कबूल करती है — व्योमगढ़ से निकाले जाने का, चोरी के इलज़ाम का, और उस राजकुमार का जिसने उसे प्यार किया और फिर उसे बचाया नहीं। डिब्बे में शहर का सबसे पुराना, अकलंक तार है, जिसे लौटाना अब नैना का कर्ज़ है। धूप की आदी आँखों के साथ नैना ऐसे शहर में उतरती है जहाँ रोशनी अपराध है, जहाँ उसकी बोली गँवारू है, उसका नमक अशुद्ध और उसका चेहरा किसी मरी हुई अपराधिनी की याद दिलाता है। बुनकर-राजा तमोहर अब बूढ़ा और टूटा हुआ है, उसका शहर फीका पड़ रहा है, और उसका करघा-अध्यक्ष मृगांक — जले हाथों वाला, कम बोलने वाला, हरामी कहकर पुकारा गया आदमी — नैना के तार को छूते ही समझ जाता है कि पूरे शहर की बुनियाद एक झूठ है। तुलाघर की मालकिन कौशिकी यह झूठ चालीस बरस से बहीखाते में सहेजती आई है, और उसे बचाने के लिए वह किसी को भी कलंकित कर सकती है — फिर से। दो समयरेखाओं में बुनी यह कहानी एक साथ चलती है: नैना की वर्तमान यात्रा और कमलादेवी की चालीस बरस पुरानी जवानी। दूसरे मौक़ों, परिवार, और उस भक्ति की कथा — जो कभी प्रेम बनती है, कभी बदला। अंत में सवाल एक ही रहता है: अगर तीन सौ बरस की रात फाड़ दी जाए, तो पहली सुबह की क़ीमत कौन चुकाएगा?
Book details
- Genres:
- Classic Romance, फंतासी रोमांस, राजनीतिक फंतासी, पारिवारिक गाथा
- Language:
- hi
- Published:
- 2026-07-31
- Content rating:
- R